शुक्रवार, 25 दिसंबर 2009

कोशी त्रासदी - नदी खोलो बांध तोड़ो

दुई पाटन के बीच में - एक dacumentary फिल्म है, इसके फ़िल्मकार हैं श्री अरविन्द सिन्हा । श्री अरविन्द सिन्हा को आठ राष्ट्रपति पुरस्कार और ७ अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त है। बड़ी नदी को और वो भी कोशी जैसी ध्वंसकारी नदी को बांधने से क्या हो सकता है, उसी बात को इस वृत्तचित्र में तफसील से बताने की कोशिश की गयी है। विज्ञान को ही सर्वस्व मानाने वाले सभ्य समाज के सामने यह फिल्म बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न लगता है। दस बरस
पूर्व बने इस फिल्म में इन सवालों को बहुत ही मार्मिक ढंग से उठाया गया है जिनके ऊपर आज कल के हुक्मरान, नौकरशाह और टेक्नोक्रेट नहीं समझाते हैं। जिस कोशी-कमला को बांधकर मिथिला को फायदा पहुँचाने की बात कही गयी थी, आज उन्ही बांधों से मिथिला तबाह-ओ-बर्बाद हो रहा है, तो इन सवालों के जवाब देने वाले कहाँ हैं, कोई इस बारे में कुछ बताता क्यों नहीं। कोशी-कमला को बांधने से पहले बाढ़ से हर साल मात्र २३ लाख लोग प्रभावित होते थे, आज उसी कोशी कमला को बाँधने के बाद हर साल बाढ़ से ६५ लाख से ज्यादा लोग प्रभावित होते हैं। बिहार सरकार से लेकर भारत सरकार तक सभी कोशी को बेचकर बिहार और मिथिला की जनता को ठगा हैं। मिथिला और बिहार की जनता अब और बाँध के खेल को चलने नहीं देगी। कोशी और कमला के साथ बहने वाले गाद मिटटी के कारण आज बांध के बीच बहने वाली नदी ऊपर हो गयी हैं और बांध के बहार रहने वाले लोग ही निचे हो गए हें, ये कैसा बांध का विज्ञान हैं।
पहले कोशी कमला इलाके के लोग मालिक होते थे भारत और बिहार सरकार की एक निति से सभी १९६४ के बाद से नौकर और मजदूर बनकर रह गए। कोशी नहर का खेल भी अभी तक चल ही रहा हैं। लाखों हेक्टेएर
सोना उगलने वाली जमीन को औने पौने दाम में लेकर सरकार ने आज तक एक बूँद पानी कोशी नहर में नहीं छोड़ा और पूरे बिहार के engiineeron ने हजारों karoron रुपये डकार लिए। सवाल उनके पैसे डकारने के नहीं हें सवाल केवल एक हैं और वह हैं मिथिला की जनता के नदियों के साथ सदियों सदियों के रिश्ते का हैं और सवाल हैं इन नदियों को उनके बांधों से मुक्ति का। मिथिला के लोग जो हजारों सालों से नदियों के साथ रहते आए हें, उन्हें किसी बाहरी विज्ञान की जरूरत नहीं हैं और न ही किसी सरकार के बनाये गए किसी बाँध की कोई जरूरत नहीं हैं। मिथिला के पानी के साथ पानी के बीछ में रह कर रोटी- दाल -मांछ -साग-आलू सन्ना खाकर जी लेंगे और इतने आत्मनिर्भर इन्ही नदियों की पानी से हो लेंगे क़ि उन्हें किसी बिहार सरकार या किसी भारत सरकार के सामने हाथ फ़ैलाने की जरूरत नहीं होगी।
आशा हैं हमारी बात मिथिला-बिहार-भारत का कोई सपूत पूरी शिद्दत के साथ समझेगा और मेरे नदी खोलो-बांध तोड़ो अभियान का सहभागी बनेगा। आमीन ।

इन वर्षों में और क्या क्या हुआ यह ब्लॉग में आगे पढ़ें।

2 टिप्‍पणियां:

  1. koshi-Kamala are two rivers coming out of the Himalayas and during rainy season they get flooded and accumulate mud and spread it throughout Mithila. The problem erupted due to embanking of the two devastating rivers which was the idea put forward by the modern leaders and technocrats for better channelisation of canal system for irrigation.
    Later the problem of siltation in the base of Barrage of Koshi and between the both Embanked rivers has grown in size. The technocrat repeatedly denied the fact of siltation in both the areas and submitted false reports to the Govt.s and to the public.
    The only way out is to open the river and break the embankments of bothe the rivers and other rivers of mithila like, Baghmati, Kareh, Mahananda, etc. to name a few.

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  2. शत प्रतिशत सहमत हूँ। नदियों को बाँधने से समस्या विकराल हुई है। इसने मात्र लोगों को ही नहीं हमारे प्राकृतिक संसाधनों को भी नष्ट किया है। स्थानीय संसाधनों को नष्ट कर विकास का सपना वास्तव में लोगों को पराधीन बनाने की सुविचारित योजना का हिस्सा है।

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